Goverdhan pooja 2020

दीपावली के अगले दिन यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। लोग इस पर्व को अन्नकूट के नाम से जानते हैं ।
“इस त्यौहार का पौराणिक महत्व है इस पर्व में प्रकृति और मानव का सीधा संबंध है। स्थापित होता है इस पर्व में गोवर्धन यानि गौ माता की पूजा की जाती हैं”। शास्त्रों में बताया गया है कि, गाय उतनी ही पवित्र है जितनी मां गंगा का निर्मल जल आमतौर पर यह पर्व अक्सर दीपावली के अगले दिन ही पड़ता है। किंतु यदा-कदा दीपावली और गोवर्धन पूजा के पर्व के बीच 1 दिन का अंतर आ जाता है।

गोवर्धन पूजा वैज्ञानिक रहस्य

देवी देवताओं में आस्था रखने वाले कुछ लोग आलसी प्रकृति के हो जाते हैं क्योंकि, उनके अंदर यह भावना बन जाती है कि, हम जिस भी देवी या देवता की पूजा कर रहे हैं, या करते हैं वह हमारे सभी कार्य पूर्ण करेंगे किंतु, वह यह भूल जाते हैं कि, देवी या देवता प्रत्यस्यश सहायता नहीं करते बल्कि सादर्शी बुद्धि ही प्रदान करते हैं।
सादर्शी बुद्धि का अर्थ है कि, जैसे आप कामना करते हैं वैसी  बुद्धि देवी देवता प्रदान करते हैं। फिर आप उस बुद्धि का उपयोग करके अपनी कामना को स्वयं अपने हाथों से पूर्ण करें लेकिन, लोग ऐसा नहीं करते, भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन को उठाकर लोगों को यही संदेश दिया था कि, आलसी व्यक्ति प्राप्त साधनों का सदुपयोग ना करके देव को नौकर की तरह सभी कार्य कर डालने के लिए पुकारता है। जैसे उन्होंने कहा कि इंद्र की पूजा क्यों करते हो पाने की आवश्यकता की पूर्ति तो गोवर्धन करता है। उन्होंने अतिवृष्टि से बचाव के लिए गोवर्धन उठाकर जलरोधक सुरक्षा बांध के रूप में करके पर्वतीय ऊंचे स्थानों पर आवास व्यवस्था करके प्रलनकारी बेगो की शक्ति को व्यस्त कर दिया। गौ का अर्थ पृथ्वी और गाय दोनों से है, गोवर्धन अर्थात पृथ्वी पर हरियाली की वृद्धि और गौ की वृद्धि यही गोवर्धन का संदेश है।

गोवर्धन पूजा की तिथि व व शुभ मुहूर्त

हिंदू कैलेंडर के अनुसार गोवर्धन पूजा इस वर्ष 2020 में 15 नवंबर के दिन रविवार को है।
गोवर्धन पूजा पर्व तिथि- 15 नवंबर 2020 (रविवार)
गोवर्धन पूजा सायं काल मुहूर्त- 03:17 pm से 5:24 pm तक।
प्रतिपदा तिथि प्रारंभ- 10:36 (15 नवंबर 2020 ) से
प्रतिपदा तिथि समाप्त- 07:05 (16 नवंबर 2020) तक।

पूजा का महत्व

माना जाता है कि, भगवान कृष्ण का इंद्र के मान मर्दन के पीछे उद्देश्य था कि, ब्रजवासी गौ धन एवं पर्यावरण के महत्व को समझें, और उनकी रक्षा करें। आज भी हमारे जीवन में गायों का विशेष महत्व है। गायों के द्वारा दिया जाने वाला दूध हमारे जीवन में बहुत अहम  स्थान  करता है।  यूं तो आज गोवर्धन व्रज की छोटी पहाड़ी है किंतु, इसे गिरिराज अर्थात्  पर्वतों का राजा कहा जाता है। इसे यह महत्व या संज्ञा इसलिए प्राप्त है क्युकि, यह भगवान श्री कृष्ण के समय का एकमात्र स्थाई व स्थिर अवशेष  है। उस समय की यमुना नदी जहाँ समय समय पर अपनी धारा बदलती रही है। वहां गोवर्धन अपने मूल स्थान पर ही ऐविचलित रूप में विद्वान है। इसे भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप और उनका प्रतीक भी माना जाता है। और इसी रूप में इनकी पूजा की जाती है।
• यदि आज के दिन कोई मनुष्य दुखी है तो, वह पूरे जीवन दुखी ही रहेगा इसलिए, मनुष्य को इस दिन प्रसन्न होकर इस उत्सव को संपूर्ण भाव से मनाना चाहिए।
• इस दिन स्नान से पूर्व तिलाभ्यंक अवश्य करना चाहिए। इससे आयु आरोग्य को प्राप्ति होती है और दुख दरिद्र का नाश होता है।
• इस दिन जो शुद्ध भाव से भागवत चरणों में सादर समर्पित संतुष्ट प्रसन्न रहता है। वह वर्षभर सुखी और प्ररियाप्त सर्मद्ध  रहता है।

गोवर्धन पूजा की विधि

स पर्व में हिंदू धर्म के मनाने वाले घर के आंगन में गाय के गोबर से  गोवर्धन की मूर्ति बनाकर उनका पूजन करते हैं। इसके बाद ब्रज के शासक देवता मनाने वाले भगवान गिरिराज को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अन्य कूट का भोग लगाते हैं। गाय, बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर फूल, माला, धूप, चंदन आदि से उनका पूजन किया जाता है। गायों को मिठाई का भोग लगाकर उनकी आरती उतारी जाती है, तथा प्रदीक्षा भी की जाती है।
कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को भगवान के लिए भोग व यथा सामर्थ अन्य से बने कच्चे-पक्के भोग फल,फूल, अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ जिन्हें 56 भोग कहते है। इनका भोग लगाया जाता है। फिर सभी सामग्री अपने परिवार वालों को वितरण पर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

गोवर्धन की पूजा कैसे करें

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को  गोवर्धन उत्सव मनाया जाता है। इस दिन बलिपूजाा, अन्नकूट मार्ग, पाली आदि उत्सव भी संपन्न होते हैं। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारंभ हुई, दीपावली की अगली सुबह गोवर्धन पूजा की जाती है। लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जानते हैं। गोवर्धन पूजा में गौ धन यानि, गायों की पूजा की जाती है। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा जाता है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती है। उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वस्थ रूपी धन प्रदान करती है। गौ माता के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। और इसके प्रति के रूप में गायों की पूजा की जाती है।
दीपावली के बाद कार्तिक शुल्क प्रतिपदा पर उत्तर भारत में गोवर्धन पर्व मनाया जाता है। इसमें हिंदू धर्म के लोग घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन नाथ की तस्वीर या प्रतिमूर्ति बनाकर उनका पूजन करते हैं। इसके बाद ब्रज के देवता माने जाने वाले गिरिराज भगवान को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अन्यकूट का भोग लगाया जाता है।
गाय, बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर फूल, माला, धुब, चंदन आदि से उनका पूजन किया जाता है। गायों को मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है। गोबर से गगोवर्धन बनाकर जल, मोली, रोली, चावल, फूल, दही, तथा तेल के दीपक जलाकर पूजा करते हैं। तथा परिक्रमा करते हैं।
56 भोग बनाकर भगवान को अर्पण करने का विधान भगवत में बताया गया है। और फिर सभी सामग्री अपने परिवार मित्रों को वितरण कर प्रसाद ग्रहण करते हैं।

गोवर्धन पूजा क्यों की जाती है

गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारंभ हुई, और इसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। गोवर्धन पूजा श्री कृष्ण की भी एक लीला जुड़ी हुई है। वृज वासियों के लोग इंद्र देव की पूजा करने की तैयारी में लगे हुए थे। वृजवासी के लोग बहुत ही खुशी के साथ तैयारियां कर रहे थे, यह सब देखकर कृष्ण जी ने अपनी माता से यशोदा से पूछा? कि, हे मैया यह सब किसकी पूजा की तैयारी की जा रही है। इस पर यशोदा माता ने उत्तर दिया कि, यह सब इंद्र देव की पूजा करने की तैयारी में लगे हुए हैं, यशोदा मैया ने कहा कि, इंद्र देव वर्षा करते है।और उससे हमें अन्य और हमारी गायों के लिए घास-चारा मिलता है।यह बात सुनकर श्री कृष्ण जी ने कहा कि, हे मैया हमारी गाय तो अन्य गोवर्धन पर्वत पर चरती है। तो हमारे लिए तो वही पूजनीय होना चाहिए। इंद्रदेव तो घमंडी है वह कभी भी अपने दर्शन नहीं देते। कृष्ण की बात सुनकर व्रजवासियों ने इंद्र देव के  स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इस बात पर क्रोधित होकर भगवान इंद्रदेव ने मुसलाधार बारिश शुरू कर दी। जैसे जैसे बरसात बड़ती रही, वैसे वैसे बृजवासी के लोग परेशान हो रहे, तभी बृजवासी के लोग भगवान कृष्ण को कोसने लगे, तब कृष्ण जी ने वर्षा से लोगों की रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर गोकुल वासियों की इंद्र से रक्षा की थी। इसके बाद सभी लोग अपनी गायों सहित पर्वत के नीचे शरण ली इससे इंद्रदेव और अधिक क्रोधित हो गए। श्री कृष्ण इंद्र का अभिमान चूर करना चाहते थे, तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि, आप पर्वत के उपर रहकर वर्षा की गति को नियंत्रित करें और शेषनाग से मेड बनाकर पर्वत की ओर पानी आने से रोकने के लिए कहा।
इंद्रदेव लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे, कृष्ण ने 7 दिनों तक लगातार पर्वत को अपने हाथ पर उठाय रखा। इतना समय बीत जाने के बाद इंद्रदेव को अहसास हुआ कि, इसमें कोई साधारण मनुष्य नहीं है। तब वह ब्रमा जी के पास गए तब उन्हें ज्ञात हुआ कि, श्री कृष्णा कोई और नहीं स्वयं श्री हरि विष्णु के अवतार हैं। इतना सुनते ही इंद्र देव श्री कृष्ण जी के पास जाकर उनसे क्षमा मांगने लगे। तभी से गोवर्धन पूजा की परंपरा कायम है, और गोवर्धन पर्वत की प्रथा आज भी कायम है, और हर साल गोवर्धन पूजा और अन्नकूट त्योहार मनाया जाता है।
“माना जाता है कि इसके बाद भगवान कृष्ण ने स्वयं कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन 56 भोग बनाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा का आदेश दिया था। उसके बाद देवराज इंद्र ने श्री कृष्ण की पूजा की और उन्हें भूख लगाया।”
“मान्यता है कि इस दिन गायों को पूजा करने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते है, और इस जन्म खास तौर पर अन्नकूट  बनाकर गोवर्धन पर्वत और श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। इस दिन गाय के गोबर के टीले बनाने की भी परंपरा है, जिन्हें फूलों से सजाया जाता है। और इनके आसपास दीपक जलाये जाते हैं। और इसकी परिक्रमा की जाती है जिसे गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के जैसा माना जाता है।

गोवर्धन पर्वत की व्रत की कथा

ह घटना द्वापर युग की है। ब्रज में इंद्र देव की पूजा की जा रही थी। वहाँ भगवान कृष्ण पहुंचे और उन्होंने पूछा? कि, यहां किसकी पूजा की जा रही है। सभी गोकुल वासियों ने कहा देवराज इंद्र की तब भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल वासियों से कहा कि, इंद्र से हमें कोई लाभ नहीं होता। वर्षा करना उनका काम है और वह सिर्फ अपना काम करते हैं। जबकि गोवर्धन पर्वत हमारे गौ धन का  संवर्धन एवं संरक्षण करते हैं। जिससे पर्यावरण शुद्ध होता है, इसलिए इंद्र की नहीं बल्कि, हमको गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए। सभी लोग श्री कृष्ण जी की बात कर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे जिससे इंद्र क्रोधित हो उठे उन्होंने मेघों (बादलों) को आदेश दिया। कि जाओ गोकुल का विनाश कर दो, और भारी वर्षा से सभी भयभीत हो गए, तब श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी वाली उंगली उठाकर सभी गोकुल वासियों को इंद्र के कोप से बचाया था। जब इंद्र को ज्ञात हुआ कि, श्री कृष्ण भगवान हरि विष्णु के अवतार हैं। तो इंद्रदेव अपनी मूर्खता पर बहुत ही लज्जित हुए तथा भगवान श्री कृष्ण से माफ़ी की याचना की। तब से आज तक गोवर्धन पूजा बड़े श्रद्धा और उल्लास के साथ की जाती है।
कहा जाता है कि, भगवान कृष्ण का इंद्र के अहकार को तोड़ने के पीछे उद्देश्य ब्रजवासियों को गौ घन एवं पर्यावरण के महत्व को बदलाना था। ताकि, उनकी रक्षा करें।
आज भी हमारे जीवन में गौ माता का विशेष महत्व है। आज भी गौ द्वारा प्राप्त दूध हमारे जीवन में बेहद अहम स्थान रखता है। यूं तो आज गोवर्धन पर्वत ब्रज में एक छोटी पहाड़ी के रूप में है। किंतु, इन्हें पर्वतों का राजा कहा जाता है। ऐसी सज्ञात गोवर्धन को इसलिए प्राप्त है। क्योंकि, भगवान श्री कृष्ण के समय एक मात्र स्थान व स्थिर अवशेष है। उस काल की यमुना नदी जहां समय-समय पर अपनी धारा बदलती रहती है। वहीं गोवर्धन अपने मूल स्थान पर ही अवचलित रूप में विद्यमान रहे गोवर्धन को भगवान कृष्ण का भी स्वरूप माना जाता है। और इसी रूप में इनकी पूजा की जाती है। गर्ग संहिता में गोवर्धन के महत्व को दर्शाते हुए, कहा गया है। कि, गोवर्धन पर्वत के राजा और हरि के प्रिय इनके सामान पृथ्वी और स्वर्ग में दूसरा कोई नहीं है।

गोवर्धन पर्वत का रहस्य

थुरा जिले के करीब 22 किलोमीटर दूर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का बड़ा महत्व है। मथुरा में स्थित गोवर्धन पर्वत उत्तर प्रदेश के 1 जिले के अंतर्गत नगर पंचायत है। गोवर्धन पर्वत वह इसके आसपास के क्षेत्र को लोग व्रजभूमि भी कहते हैं। यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में ब्रज वासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाया था। और गोवर्धन पर्वत को भक्तजन गिरिराज जी भी कहते हैं। दूर-दूर से लोग इस पर्वत की परिक्रमा करने आते हैं।
कहा जाता है कि, इस गोवर्धन पर्वत का आकार हर दिन मुट्ठी भर  घट जाता है। माना जाता है कि, करीब 5000 साल पहले यह पर्वत 30000 मीटर ऊंचा हुआ करता था। लेकिन, आज लगभग यह मात्र 30 मीटर का ही रह गया है।

गोवर्धन पर्वत घटने का राज इसकी परिक्रमा के दौरान किन किन मंदिरो के दर्शन होते हैं और क्या-क्या उनकी मान्यता है आइए जानते हैं

ह पुराने इस गिरिराज पर्वत को लेकर यह माना जाता है। कि, इस पर्वत की खूबसूरती से पुलस्त्य ऋषि बहुत प्रभावित हुए, उन्होंने द्रोणाचल पर्वत से इसे उठाकर साथ लाना चाहा। तो गिरिराज ने कहा?  कि आप मुझे जहां भी पहली बार रखेंगे मैं वहीं पर स्थापित हो जाऊंगा रास्ते में साधना के लिए ऋषि ने पर्वत को नीचे रख दिया। फिर वह उसको दोबारा हिला नहीं सके। क्रोध में आकर उन्होंने पर्वत को श्राप दिया कि वह रोज घटता जाएगा।
“माना जाता है कि, उसी समय से गोवर्धन पर्वत का कद लगातार घटता जा रहा है। जिस स्थान से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा शुरू करते हैं, वहां से करीब 5 किलोमीटर चलने के बाद राजस्थान की सीमा शुरू हो जाती है। ”
गोवर्धन पर्वत करीब 10 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ था। जिसका आधा हिस्सा राजस्थान और आधा उत्तर प्रदेश राज्य में पड़ता है। इस सीमा के मध्य में दुर्गा माता का मंदिर भी है, यहां पर कुछ ही दूरी पर स्थित पूछरी का लौठा स्थान स्थित है। यहां स्थान बहुत पुराना है, इस स्थान को राजस्थान क्षेत्रीय भी कहा जाता है। सदियों से यहां दूर-दूर से भक्त गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने आते रहते हैं। यह 7 कोस  की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की है। इस मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, राधा कुंड, कुसुम, सरोवर, मानसी गंगा, गोविंद कुंड, पूछरी का लौठा और दानघाटी इत्यादि भी भी इत्यादि भी है।
गोवर्धन पर्वत से कुछ ही दूरी पर एक कुंड स्थित है। जिसे हरजी कुंड कहा जाता है। इस स्थान पर भगवान श्री कृष्णा अपने शाखाओं के साथ गाय चराने आते थे, जब हम बड़ी परिक्रमा पूरी कर लेते हैं। तो उसके बाद आता है, चूतड़ टेका और यह बहुत ही पुराना स्थान है। यह भगवान लक्ष्मण, भगवान राम, सीता माता, और राधा कृष्ण के मंदिर भी हैं। परिक्रमा मार्ग पर विट्ठल नामदेव मंदिर है। और उसके बाद राधा कुंड आता है। ऐसा माना जाता है कि, इस कुण्ड को राधा ने अपने कंगन से कूदकर बनाया था। राधा कुंड और श्याम कुंड में नहाने से गौ हत्या का पाप भी खत्म हो जाता है। वध के पुजारी कहते हैं कि, जब श्रीकृष्ण को हत्या करने की कंस की सारी योजना विफल हो रही थी, तब असुर अरिष्टासुर को भेजा गया। उस वक्त कृष्ण जी गायों को चराने के लिए गोवर्धन पर्वत पर गए हुए थे, और गोवर्धन पर्वत तक पहुंचने के बाद अरिष्टासुर ने बैल का रूप धारण किया। और गायों के साथ चलने लगा। इसी दौरान भगवान  श्री कृष्णा ने अरिष्टासुर  को पहचान लिया। और उसका वध कर दिया, इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने राधा के पास गए, और उन्हें छू लिया। इस बात से राधा बहुत नाराज हुई। और उन्होंने कहा कि, गौ हत्या करने के बाद आपने मुझे छू कर, मुझे भी पाप का भागीदार बना दिया। इस घटना के बाद राधा  ने कंगन से खोदकर कुंड की स्थापना की।
उन्होंने मानसी गंगा से पानी लेकर इसे भरा उसके बाद सभी तीर्थों को कुंड में आने की अनुमति दी। यहां राधा रानी और उनकी सभी सहेलियों ने स्नान कर गौ हत्या का पाप धो लिया।
और वही भगवान श्री कृष्ण ने गौ हत्या का पाप खत्म करने के लिए एक छड़ी से कुंड बनाया। और उन्होंने सभी तीर्थों को उसमें विराजमान किया। और उसमें  स्नान भी किया। इस मंदिर में मानसी गंगा की प्रतिमा है, और श्रीकृष्ण के स्वरूपों की पूजा की जाती है।
यह मान्यता है। कि, जब  गोवर्धन पर्वत का अभिषेक किया था। उस समय सभी चिंता में पड़ गये। कि, इतना सारा गंगा जल कैसे लाया जाये।  इस दौरान भगवान श्री कृष्णा ने अपने मन से गंगा को  गोवर्धन पर्वत को उतार दिया, इसके बाद से ही इसे मनसी गंगा कहते है। पहले यह 6 किलो मीटर  लम्बी गंगा हुआ करती थी। पर अब यह कुछ ही  स्थान में सिमटकर बह गई है।

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