Durga Puja 2020 in Hindi

श्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा यानि विजयदशमी का त्यौहार मनाया जाता है। दशहरा को विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि, इसी दिन मां दुर्गा ने राक्षस महिषासुर का वध किया, इसके अलावा इसी दिन राम की रावण पर जीत हुई थी, माना जाता है कि, देवी दुर्गा ने नौ दिनों तक महिषासुर से लड़ाई की थी और दसवें दिन जिसे दशमी तिथि भी कहते हैं। उसी दिन उन्हें विजय हासिल हुई थी। दुर्गा पूजा खासतौर से बंगाल, उड़ीसा, असम, मणिपुर त्रिपुरा, झारखंड, और बिहार में बड़े धूमधाम से बनाई जाती है। इन राज्यों में सृष्टि से लेकर दशमी तक दुर्गा पूजा का पर्व मनाया जाता है।

 

नवरात्रि का महत्व

वरात्रि एक संस्कृत शब्द है। इसका अर्थ होता है नौ रातें, नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। जो, देवी दुर्गा माता की पूजा करने के लिए रखा जाता है। नवरात्रि के दौरान माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है, यह पर्व भारतवर्ष में बहुत धूम धाम से और भक्ति भाव से मनाया जाता है पूजा आराधना करते हुए भक्तों द्वारा व्रत रखा जाता है और अंत में छोटे-छोटे कन्याओं को देवी के नौ रूप मानकर उनकी पूजा कर प्रसाद वितरण किया जाता है। नवरात्रि प्रत्येक वर्ष में 4 बार आती है।

पोश, चैत्र, असार, और अश्विन

जिसमें चैत्र मास और अश्विन मास की नवरात्रि को बहुत बड़े पर्व के रूप में मनाया जाता है। और पोश और असार आदि नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। इनमें तांत्रिक विशिष्ट सिद्धियों की प्राप्ति के लिए साधना अनुष्ठान करते हैं। शक्ति की उपासना का पर्व नवरात्रि प्रतिपदा से नवमी तक। निश्चित 9 तिथि, 9 नकशत्रक, 9 शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। शक्ति साधना में मुख्य रूप से 9 देवियों की साधना, 3 महादेवी की साधना और 10 महाविद्या की साधना आदि का विशेष महत्व है।

 

दुर्गा पूजा 2020 में कब है। 

दुर्गा पूजा 2020 में 22 अक्टूबर दिन गुरुवार को है।

• दुर्गा पूजा शुरू – 22 अक्टूबर 2020, ( गुरुवार )

• दुर्गा पूजा समाप्त – 26 अक्टूबर 2020, ( सोमवार )

दुर्गा पूजा का पहला दिनषष्ठी तिथि, 22 अक्टूबर 2020, ( गुरुवार )।

दुर्गा पूजा का दूसरा दिनसप्तमी तिथि, 23 अक्टूबर, 2020 ( शुक्रवार )

दुर्गा पूजा का तीसरा दिनमहाअष्टमी, 24 अक्टूबर 2020, ( शनिवार)।

• अष्टमी तिथि शुरू – 23 अक्टूबर 2020, 6:56am.

• अष्टमी तिथि समाप्त – 24 अक्टूबर 2020, 6:58 am.

दुर्गा पूजा का चौथा दिन – नवमी तिथि, 25 अक्टूबर 2020 ( शनिवार )

दुर्गा पूजा का पांचवा दिनदुर्गा विसर्जन, 26 अक्टूबर 2020, ( सोमवार)

• दशमी तिथि शुरू – 25 अक्टूबर 2020, 7:41 am.

• दशमी तिथि समाप्त – 26 अक्टूबर 2020, 9:00 am.

 

वर्ष में दो बार नवरात्रि क्यों मनाई जाती है 

वरात्रि साल में दो बार मनाया जाने वाला एकलौता उत्सव है। एक नवरात्रि गर्मी की शुरुआत पर चैत्र में आती है और दूसरी शीत की शुरुआत पर अश्विन माह में गर्मी और जाड़े के मौसम में सौर ऊर्जा हमें सबसे अधिक प्रभावित करती है। क्योंकि फसल पकने वर्षा जल के लिए बादल संगठित होने और ठंड से राहत देने आदि जैसे जीवन उपयोगी कार्य इस दौरान संपन्न होते हैं। इसलिए पवित्र शक्तियों की आराधना करने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। प्रकृति में बदलाव के कारण हमारे तन, मन और मस्तिष्क में भी बदलाव आते हैं। इसलिए शरीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए हम उपवास रखकर शक्ति की पूजा करते हैं।

• एक बार यह सत्य और धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है। और वहीं दूसरी ओर इसे भगवान श्री राम के जन्मोउत्सव के रूप में मनाया जाता है।

 

क्यों मनाते हैं नवरात्रि

वरात्रि मनाने के पीछे दो कथाएं हैं।

(i)- प्रथम कथा स कथा के अनुसार, लंका युद्ध में ब्रह्मा जी ने श्री राम से रावण वध के लिए चंडी देवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा, और विधि के अनुसार चंडी पूजन के लिए और हवन के लिए दुर्लभ 108 नीलकमल की व्यवस्था भी कर दी। वहीं दूसरी और रावण ने भी अमृत प्राप्त के लिए चंडी पाठ करना शुरू कर दिया। यह बात पवन के माध्यम से इंद्रदेव ने श्रीराम तक पहुंचा दी इधर रावण ने मायावी तरीके से पूजा स्थल पर हवन सामग्री में से एक नीलकमल गायब कर दिया। जिससे श्री राम की पूजा बंधित हो जाए श्रीराम का संकल्प टूटता नजर आया सभी ने इसी बात का भय व्याप्त हो गया। कि, उन्हे कमल नयन नवकंज लोचन भी कहा जाता है। तो उन्होंने अपने एक नेत्र को मां की पूजा में समर्पित करने की बात सोची। श्रीराम ने जैसे ही तुदिर से अपने नेत्र को निकालना चाहा तभी मां दुर्गा प्रकट हुई, और उन्होंने कहा कि वह पूजा से प्रसन्न हुई है। और उन्होंने विजय का आशीर्वाद दिया। दूसरी तरफ रावण की पूजा के समय हनुमान ब्राह्मण बालक का रूप धारण कर वहां पहुंच गए। और पूजा कर रहे ब्राह्मणों में से 1 श्लोक जया देवी भूता हरणी के स्थान पर करणी उच्चारित कर दिया हरणी का अर्थ होता है। “भक्तों की पीड़ा” करने वाला और करणी का अर्थ होता है। “पीड़ा देने वाला”। इससे मां दुर्गा नाराज हो गई, और रावण को श्राप दिया कि रावण का सर्वनाश हो।

(ii)- दूसरी कथा – स कथा के अनुसार, महिषासुर को उसकी उपासना से खुश होकर देवताओं ने अजय होने का वर प्रदान किया। इस वरदान को पाकर महिषासुर ने उसका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और नर को स्वर्ग के द्वार तक विस्तारित कर दिया। महिषासुर ने सूर्य, चंद्र, इंद्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण और अन्य देवताओ के भी अधिकार छीन लिए। और स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के भय से पृथ्वी पर विचरण करना पढ़ा। तब महिषासुर से दुस्साहस क्रोधित होकर देवताओं ने मां दुर्गा की रचना की महिषासुर का वध करने के लिए देवताओं के अपने सभी अस्त्र-शस्त्र मां दुर्गा को समर्पित कर दिया। जिससे वह बलवान हो गई और 9 दिनों तक उसका महिषासुर से संग्राम चला। अंत में महिषासुर का वध करके मां दुर्गा महिषासुर मर्दिनी कहलाई।

 

क्यों विशेष है चेत्र नवरात्रि

वरात्रि वह समय है। जब दोनों ऋतुओं का मिलन होता है तब हम मुख्य रूप से हम दो नवरात्रों को मनाते हैं।

(i)-चेत्र नवरात्र,  (ii)- अश्विन नवरात्र।

चैत्र नवरात्र गर्मियों के मौसम की शुरुआत करता है और प्रकृति एक प्रमुख जलवायु परिवर्तन से गुजरती है । साथ ही यह एक लोकप्रिय धारणा है कि, चैत्र नवरात्र के दौरान उपवास का पालन करने से शरीर प्रकृति के लिए बदलाव के लिए तैयार हो जाता है। यह उत्तरी भारत में बहुत लोकप्रिय है चैत्र नवरात्र के पहले दिन की उर्जा मां दुर्गा को संपत्ति है, अगले 3 दिन की देवी मां लक्ष्मी, को संपत्ति है, और आखिरी के 3 दिन ज्ञान की देवी मां सरस्वती को संपत्ति होते हैं। नवरात्रि के पहले दिन घर स्थापना सबसे आवश्यक है जो, ब्रह्मांड का प्रतीक है और घर में शुद्धि और खुशहाली लाता है। इसके साथ ही उपवास प्रारंभ होता है और माता की चौकी स्थापित की जाती है।

• नवरात्रि पूजा शुरू करने से पहले हरि की अखंड ज्योत जलाए। यह आपके घर की अखंड नकारात्मक उर्जा कम करता है। और मानसिक संतोष बढ़ाता है। साथी ही साथ जौ के बुआरे बोए जाते हैं।

“ऐसी मान्यता है कि, जौ इस सृष्टि की सबसे पहली फसल थी इसे हवन में भी चढ़ाया जाता है। वसंत ऋतु की सबसे पहली फसल “जौ” ही है। नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी का प्रतिनिधित्व किया जाता है। दुर्गा सप्तशती शांति समृद्धि और धन का प्रतीक है। और नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान दुर्गा सप्तशती के पाठ करना अत्यंत शुभदायी माना जाता है। आखिरी दिन में माता को हलवा पूरी, काले चने का भोग लगाया जाता है और फिर कन्याओं जिन्हें माता का प्रतिनिधि माना गया है। उनका पूजन करके माता विद्या किया जाता है।

 

माँ दुर्गा के नौ प्रकार के रूप

मां दुर्गा का पहला रूप –  शैलपुत्री

मां दुर्गा को सर्व प्रथम शैलपुत्री के रूप में जाना जाता है। हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नामकरण शैलपुत्री हुआ उनका वाहन वृषभ है इसलिए यह देवी प्रसाद वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती है। इन देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है, और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है यही देवी प्रथम दुर्गा है, यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं।

मां दुर्गा का दूसरा रूप – ब्रह्मचारिणी

नवरात्र पर्व के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चना की जाती है। भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्रारिणी यानि ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना विद्यार्थियों को जरूर करनी चाहिए इस दिन पीले या सफेद रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करनी चाहिए।

मां दुर्गा का तीसरा रूप – चंद्रघंटा

माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का अत्याधिक महत्व है। और इस दिन इन्ही की पूजा आराधना की जाती है। तृतीय शक्ति के रूप में विराजमान माँ चंद्रघटा मस्तक पर चंद्रमा को धारण किए हुए है धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है। कि नवरात्र के तीसरे दिन उनकी पूजा-अर्चना भक्तों को जन्म जन्मांतर के कष्टों से मुक्त कर इस लोक और परलोक में कल्याण प्रदान करती हैं। जैसे व्यक्ति के रूप में विराजमान देवताओं ने कहा है।

मां दुर्गा का चौथा रूप – कुष्मांडा देवी

नवरात्र पूजन के चौथे दिन कूष्मांडा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन अदाहट चक्र में अवस्थित होता है मां दुर्गा अपने चतुर्थ स्वरूप में कुष्मांडा के नाम से जानी जाती है। नवरात्र के चौथे दिन आयु यश बल ऐश्वर्या को प्रदान करने वाली भगवती कुष्मांडा की उपासना आराधना का विधान है। कुष्मांडा देवी सूरज के घेरे में निवास करती है इसलिए कुष्मांडा देवी के अंदर इतनी शक्ति है जो सूरज की गर्मी को सहन कर सके।

मां दुर्गा का पाँचवा रूप – स्कंदमाता

नवरात्रि का पांचवा दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। धार्मिक ग्रंथों ने स्कंदमाता को मोक्ष के द्वार को मोक्ष खोलने वाली माता और परम सुखदाई के रूप में पूजा जाता है। मां अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती है। स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं भगवान स्कंद की माता होने के कारण ही उन्हे स्कंदमाता कहा जाता है। मान्यता है कि, सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण उनकी मनोहर छवि पूरे ब्राह्मण में प्रकाशमान होती है।

मां दुर्गा का छठा रूप – कात्यायनी देवी

मां दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी देवी है। महिर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न होकर माता ने आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी, और नवमी तक 3 दिन कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था। कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना और तपस्या की उनकी इच्छा थी कि, उन्हें पुत्री प्राप्त हो तब माता मां भगवती ने कात्यायनी के रूप में उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया।

मां दुर्गा का सातवां रूप – कालरात्रि

मां दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। नवरात्र के साथ में में दिन मां कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्त्रार चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मड की सारी सिद्धियों के खुलने लगते है, और तमाम आसुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं।

मां दुर्गा का आठवाँ रूप – महागौरी

मां दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। नवरात्र के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सघ: फलदायिनी है। इसकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं। माँ का यह स्वरूप आस्था, श्रृद्धा, और विश्वास रूपी, श्वेत प्रकाश को अपने जीवन में धारण करते हुए अलौकिक कांति तेज से संपन्न होने का संदेश प्रदान करता है।

मां दुर्गा का नौवां रूप – सिद्धिदात्री

मां दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली देवी है। नवरात्र पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि, भगवान शिव ने इस देवी की कृपा से यह तमाम सिद्धियां प्राप्त की थी। इस देवी की कृपा से शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए।

 

 

 

 

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